गांव में रहने वाला भला “सिटिजन” कैसे हो सकता है?

भारतीय संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक इंडियन सिटिजन्स के संबंध में बात की गई है। सिटिजन्स को लेकर भारतीय संसद ने एक कानून भी बनाया है जिसका नाम है- द इंडियन सिटिजनशिप एक्ट, 1955। इन दोनों दस्तावेजों का हिंदी अनुवाद उपलब्ध है जिसमें सिटिजन का अनुवाद नागरिक के तौर पर हुआ है। वैधानिक रूप से गांव में रहने वाला भी नागरिक हो सकता है किंतु क्या भाषा विज्ञान, मनोविज्ञान या दार्शनिक दृष्टिकोण से यह उचित है?
हम सभी जानते हैं कि सिटिजन शब्द की उत्पत्ति यूनान के छोटे-छोटे नगर राज्यों से हुई है जिन्हें ब्रिटेन, अमेरिका सहित यूरोप के लगभग सभी देश अपना सांस्कृतिक जनक मानते हैं। उन दिनों यूनान में सत्ता इन शहरों में रहने वालों के पास ही हुआ करती थी। शहरों में एक तरह का लोकतंत्र होता था जिसमें शहर के लोग  मिलकर अपने शहर और आस-पास की दास आबादी का शासन चलाते थे। शहर की चारदीवारी के बाहर रहने वाले लोग सत्ता में हिस्सेदारी नहीं कर पाते थे। लेकिन व्यवहारिक कारणों से उन्हें भी अपनी पहचान शहरों से जोड़कर रखनी पड़ती थी। अपने को किसी न किसी शहर से जोड़कर रखना उनकी मजबूरी थी।
आइए अब देखते हैं कि भारत के मनीषी अपने यहां के लोगों को कैसे परिभाषित करते थे। इस संबंध में विष्णु पुराण का प्रसिद्ध श्लोक है –

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् | वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ||

अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है उसे भारत कहते हैं तथा उसकी संतानों को भारती कहते हैं। इसी प्रकार वेदों में एक और शब्द खूब आया है और वह है राष्ट्र। आजकल राष्ट्र का अनुवाद अंग्रेजी के नेशन से होता है। लेकिन अंग्रेजी का नेशन और वेदों में उल्लिखित राष्ट्र में समानता कम और असमानता कहीं अधिक है।
अब प्रश्न उठता है कि भारतीय लोकतंत्र में हर उस व्यक्ति को जिसे इसमें हिस्सेदार बनाया गया है, क्या कहा जाए? जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो आज भी गांवों में रहने वालों की संख्या अधिक है। शहरों में जो लोग रह रहे हैं, उसमें भी अधिसंख्यक किसी न किसी गांव से ताल्लुक रखते हैं। चूंकि लोकतंत्र में सबकुछ संख्या बल से तय होता है तो क्या यह उचित नहीं होगा कि भारतीय लोकतंत्र के सभी शहरी और देहाती हिस्सेदारों को हिंदी में ग्रामिक और अंग्रेजी में विलेजन कहा जाए? मुझे कोई दूसरा बेहतर शब्द नहीं सूझ रहा है। यदि इसके लिए भाषा शास्त्री कोई बेहतर शब्द ढूंढ दें तो मैं उनका आभारी रहूंगा। लेकिन कुछ भी हो गांव का निवासी होते हुए भी मुझे नागरिक या सिटिज़नकहलाना पसंद नहीं है।

विमल कुमार सिंह
संयोजक, मिशन तिरहुतीपुर

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