ग्रामयुग- क्या, क्यों और कैसे ?

हमारी इच्छा है कि देश मे ग्रामयुग आए। एक ऐसा युग जहां गांव शहरों के पिछलग्गू नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्वतंत्र वाहक बनें। उनके बीच शोषक-शोषित या छोटे-बड़े का नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक होने का रिश्ता बने। मोटे तौर पर हम ग्रामयुग को रामराज्य, प्रकृति केन्द्रित विकास, व्यवस्था परिवर्तन और अक्षय विकास जैसे शब्दों का समानार्थी मानते हैं। ग्रामयुग का यह कतई मतलब नहीं है कि गांवों को फिर से अतीत में ले जाने की कोशिश की जाए। हम बिल्कुल ऐसे गांवों की वापसी नहीं चाहते जो एक समय जातीय दुराग्रह, अभाव और पिछड़ेपन के प्रतीक बन गए थे। वास्तव में हम उस युग में प्रवेश करना चाहते हैं जहां गांव नवाचार और नई सोच के साथ शहरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत के सुंदर भविष्य की जमीन तैयार करेंगे।

ग्रामयुग के बारे में आगे और चर्चा करने के पहले यह समझ लेना चाहिए कि गांव वास्तव में क्या है? गांव की परिभाषा क्या है? असल में गांव को सही-सही परिभाषित करना आसान नहीं है। अलग-अलग संदर्भों में इसका मतलब बदल जाता है। कुछ लोग तो ग्लोबल विलेज की भी बात करते रहते हैं। लेकिन प्रायः गांव उस छोटी आबादी वाली बसावट को कहते हैं जो मुख्यतः खेती-बारी में लगी हो। हालांकि ऐसे कई उदाहरण भी मिल जाएंगे जहां गांवों की आबादी किसी छोटे-मोटे शहर के बराबर है और वहां के लोग खेती-बारी भी नहीं करते। गांव का एक अर्थ अभाव कि जिंदगी से भी जोड़ दिया गया है जो अनुचित है। आज कई ऐसे गांव है जहां अभाव का नामोनिशान नहीं मिलेगा।

बात आगे बढ़ाएं, इसके पहले डेसमंड मोरिस की मशहूर किताब – The Human Animal: A Personal View of the Human Species का उल्लेख यहां प्रासंगिक है। इसी नाम से उन्होंने डिस्कवरी चैनल के साथ मिलकर बीबीसी के लिए 6 एपीसोड में एक टीवी सीरीज भी बनाई है। इसी के तीसरे एपीसोड में उन्होंने बड़ा रोचक प्रयोग किया था। उन्होंने एक आदमी को दिल का दौरा पड़ने का नाटक करने के लिए कहा। पहले उसने यह नाटक लंदन जैसे बड़े शहर में एक भीड़भाड़ वाले पैदल मार्ग पर किया। दूसरी बार उसने इसे एक छोटे से गांवनुमा कस्बे में दोहराया। शहर में उसे मदद मिलने में कई घंटे लगे, जबकि गांव में उसे कुछ ही मिनटों में मदद मिल गई। 

इस तरह के कई अनुभव या किस्से स्वयं आपने भी सुने या देखे होंगे। डेसमंड मोरिस ने इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है। उसका कहना है कि मनुष्य बड़े शहरों में रहने तो लगा लेकिन उसका मन-मष्तिष्क और उसकी जैविक संरचना अभी भी गांव नुमा माहौल में ही ठीक से काम करती है। मोरिस का कहना है कि शहरों में रहने वाले मनुष्यों का अवचेतन मन अनजान मनुष्यों को जंगल में उगे पेड़े-पौधों से अधिक कुछ नहीं मानता। लेकिन वही मनुष्य जब गांव के परिवेश में जाता है तो उसका व्यवहार बदल जाता है। वह अनजान मनुष्यों से भी परिचितों जैसा व्यवहार करने लगता है। अंतरिक्ष पर पहुंच जाने के बावजूद आज भी मनुष्य जैविक रूप से गांव में ही सहज महसूस करता है। शहर में उसका व्यवहार वैसा ही होता है जैसा चिड़ियाघर मे जानवरों का। मोरिस के विचार आपको अतिवादी लग सकते हैं, लेकिन एक बार उसकी टीवी सीरीज देख लेंगे तो हो सकता है आपका सोचने का नजरिया बदल जाए।

आइए अब चर्चा करते हैं उत्तर प्रदेश के गंवई परिवेश को लेकर 1982 में बनी एक बड़ी सुंदर फिल्म की, जिसका नाम है– नदिया के पार। इस फिल्म में नायिका गुंजा नायक चंदन के साथ उसके गांव जा रही है। कुछ दूर चलने के बाद वह चंदन से पूछती है, “…कितनी दूर अभी कितनी दूर है, ऐ चंदन तोरा गांव हो…” जवाब में चंदन कहता है, “…जब कोई बुलाए लेके नाम हो…” अर्थात जहां पहुंचते ही लोग मुझे मेरा नाम लेकर पुकारने लगें, समझ लेना कि वही मेरा गांव है। गांव की इतनी सटीक परिभाषा आपको शायद ही कहीं और मिले। गाने की इस छोटी सी पंक्ति में पूरा दर्शन छिपा है। असल में गांव वही है जहां आप सबको जानते हैं और सब आपको जानते हैं, जहां आप का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, जहां आप हमेशा किसी के बेटे, भाई, पिता, पति, पत्नी जैसे अनगिनत रिश्तों को अपने साथ लेकर चलते हैं। संबंध और जान-पहचान आपकी शहर में भी हो सकती है, वो भी हजारों मे। लेकिन वहां आपकी पहचान केवल आपकी पहचान होती है। उस पहचान के साथ संबंधों का काफिला नहीं चलता। 

भावी ग्रामयुग को हम एक ऐसे युग के रूप में देखना चाहते हैं जहां हर एक शहरी किसी न किसी गांव के साथ जुड़ा हुआ हो। जिनके अपने पुश्तैनी गांव हैं, वे अपने-अपने गांवों में सक्रियता बढ़ाएं। लेकिन जिनका अपना कोई पुश्तैनी गांव नहीं है, वे भी किसी न किसी गांव से भावनात्मक रूप से जुड़ें। ग्रामयुग का यह प्लेटफार्म इस दिशा में अपना कदम आगे बढ़ा चुका है। यह हमारी प्राथमिकता का विषय है। प्रख्यात चिंतक श्री के.एन. गोविंदाचार्य ने तिरहुतीपुर को भावनात्मक रूप से अपनाकर इस मुहिम में जान डाल दी है। उनका अपना कोई पुश्तैनी गांव नहीं है। लेकिन आज वे भी गांव वाले बन चुके हैं। उनका तिरहुतीपुर के साथ रिश्ता काफी हद तक सांकेतिक है। लेकिन उस संकेत में ही भावी सृजन के बीज छिपे हैं।

ऐसा नहीं है कि आज के गांवों में सब कुछ ठीक चल रहा है। वास्तविकता यह है कि वहां समस्याओं का अंबार लगा है। जिस पारस्परिकता और संबंधों की बुनावट की हम बात कर रहे हैं, वह अब गांवों में भी कमजोर पड़ने लगी है। हमें सभी तरह के उपाय करके इसे न केवल बचाना है, बल्कि और मजबूत भी करना है। गांवों में सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल, फसलों की कीमत और तमाम तरह की भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराने से यह काम कहीं ज्यादा जरूरी है। यदि इसे ठीक कर लिया गया तो बाकी समस्याओं से निपटना बहुत आसान हो जाएगा। गांव के लोगों में पारस्परिकता और संबंधों की गर्माहट को कायम रखने के लिए अतीत में जो उपाय किए जाते थे, उनके साथ-साथ कुछ नए उपाय भी करने होंगे। ग्रामयुग के इस प्लेटफार्म से इस दिशा में कई तरह के प्रयोग और प्रयास किए जा रहे हैं।

गांव के सथ भावनात्मक और क्रियात्मक दोनों स्तर पर जुड़ाव रखने वाले लोग आज पूरे देश में शायद 2-3 प्रतिशत भी न हों। हमें इसे बढ़ाना है। पहले हमें सभी तरह से जतन करके भावनात्मक जुड़ाव रखने वालों की संख्या बढ़ानी होगी, भले ही उसका कोई सीधा-सीधा क्रियात्मक आयाम न हो। इसी से ग्रामयुग की पीठिका तैयार होगी। स्वाभाविक है इसमें नए तरह के लड़ाके और ऩए तरह के औजार ही इस्तेमाल होंगे। रामराज्य, प्रकृति केन्द्रित विकास, व्यवस्था परिवर्तन और अक्षय विकास जैसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की ओर बढ़ने का यही सबसे आसान और सबसे प्रभावी मार्ग है।

विमल कुमार सिंह
संयोजक, मिशन तिरहुतीपुर

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