विचार

श्री के.एन. गोविन्दाचार्य का व्यक्तित्व ऐसा है कि उन्हें एक साथ हम राजनेता, समाजसेवी, संत, विचारक और मनीषी जैसे कई विशेषण दे सकते हैं। 77 वर्ष की उम्र में भी उनकी सक्रियता चकित कर देती है। देश भर में सैकड़ों ऐसे व्यक्ति, संस्थान और अभियान हैं जो उनके मार्गदर्शन में काम करते हैं। गत वर्ष उन्होंने वाराणसी के पास एक गुमनाम से गांव को अपना गांव बनाने का फैसला किया। इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर संवाद मीडिया की ओर से श्री विवेक त्यागी ने उनसे लंबी बातचीत की। 11 मई, 2020 को हुई इस बातचीत के संपादित अंश यहां आपके लिए प्रस्तुत हैं।

भारतीय लोकतंत्र में हर उस व्यक्ति को जिसे इसमें हिस्सेदार बनाया गया है, क्या कहा जाए? जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो आज भी गांवों में रहने वालों की संख्या अधिक है। शहरों में जो लोग रह रहे हैं, उसमें भी अधिसंख्यक किसी न किसी गांव से ताल्लुक रखते हैं।

मारी इच्छा है कि देश मे ग्रामयुग आए। एक ऐसा युग जहां गांव शहरों के पिछलग्गू नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्वतंत्र वाहक बनें। उनके बीच शोषक-शोषित या छोटे-बड़े का नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक होने का रिश्ता बने। मोटे तौर पर हम ग्रामयुग को

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