21. हमारा किष्किंधा कनेक्शन

आज विजयदशमी के दिन आपको मैं अतीत में 14 वर्ष पीछे ले चलता हूं। यह बात वर्ष 2007 की है, तब मैं गोविन्दजी के साथ सुदूर दक्षिण किष्किंधा गया था। हम वहां बसवराज पाटिल जी, सेडम के बुलावे पर गए थे। उद्देश्य था कि पंपा सरोवर के पवित्र तट पर बैठकर आगे की दशा-दिशा तय की जाए। आज बहुत कम लोग जानते हैं कि रामायण में वर्णित किष्किंधा अब कर्नाटक के कोप्पल जिले में स्थित है।

भगवान राम की कथा में अयोध्या प्रारंभ है, लंका परिणाम है लेकिन किष्किंधा प्रक्रिया है। वह प्रारंभ और परिणाम दोनों को जोड़ती है। प्रायः हम सब कोई काम प्रारंभ करते ही परिणाम को लेकर चिंतित हो जाते हैं। प्रक्रिया को लेकर हम उतने सचेत नहीं रहते। तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य में किष्किंधा को एक अध्याय (कांड) के रूप मे स्थापित कर यह संदेश दिया है कि प्रक्रिया का कितना महत्व है। बिना प्रक्रिया (किष्किंधा) को साधे शुभ परिणाम (लंका विजय और रामराज्य) असंभव है।

तुलसीदास जी के लिए किष्किंधा अर्थात प्रक्रिया का कितना महत्व था, इसे इस बात से समझिए कि उन्होंने केवल 3 स्थानों के नाम से अपने अध्यायों का नामकरण किया है। एक अयोध्या, दूसरा लंका और तीसरा किष्किंधा। जैसे लंका और अयोध्या के बिना राम और रामायण अधूरी है, वैसे ही किष्किंधा के बिना भी राम और रामायण की तस्वीर पूरी नहीं होती है।

किष्किंधा यात्रा के दौरान ये सारी बातें सहज ही अवचेतन मन में कहीं गहरे बैठ गईं। दस साल बाद जब गोविन्दाचार्य जी और बसवराज पाटिल जी, सेडम की प्रेरणा से एक औपचारिक संस्था बनाने की बात चली तो मैंने किष्किंधा को आधार बनाकर नाम रखने का सुझाव दिया। सबने मेरा यह सुझाव मान लिया और इस प्रकार 2017 में “सनातन किष्किंधा मिशन” का गठन हुआ। गोविन्दजी के विचारों को आधार बनाकर टैक्टिकल लेवल पर काम करना ही इस संस्था का मुख्य उद्देश्य निर्धारित किया गया।

मुझे खुशी है कि किष्किंधा यात्रा के 14 वर्ष बाद आज विजयदशमी के दिन गोविन्दजी ने मिशन तिरहुतीपुर के संचालन की जिम्मेदारी औपचारिक रूप से “सनातन किष्किंधा मिशन” को सौंप दी है। यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि इस बदलाव से मिशन को लेकर मेरी जिम्मेदारी में कोई कटौती नहीं हुई है। हां, इस बदलाव से आप सभी की जिम्मेदारी जरूर बढ़ गई है।

आदर्श स्थिति में समाज का काम समाज के ही सहयोग से ही होना चाहिए। किसी एक या कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के बल पर समाज का काम शुरू तो हो सकता है, लेकिन उसे शीघ्र ही जनता के बीच ले जाया जाना चाहिए। जन-जन की भागीदारी के बिना कोई सामाजिक कार्य व्यापक बदलाव का माध्यम नहीं बन सकता। रामायण में भी इसी बात को रेखांकित किया गया है।

ध्यान से देखें तो भगवान राम का संघर्ष तीन चरणों में बंटा हुआ है। सबसे पहले वे अपने भाई और पत्नी के साथ अकेले वन में संघर्ष करते हैं। उसके बाद दूसरे चरण में वे सामान्य जन (किष्किंधा के लोगों) से सहयोग लेते हैं। जब किष्किंधा की जन-सेना के साथ राम का संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंचता है, तब तीसरे चरण में उन्हें इंद्र का सहयोग मिलता है और वह भी बिना मांगे।

भगवान राम के जीवन से सीख लेते हुए मैंने मिशन तिरहुतीपुर को तीन चरणों में बांटा है। पहला चरण जो इस दशहरा को पूरा हो गया, वह काफी हद तक मेरा व्यक्तिगत उपक्रम था। इसमें मैंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता को आधार बनाकर काम किया और समाज का सक्रिय सहयोग लेने से बचता रहा। दूसरा चरण जो इसी दशहरा से शुरू हो रहा है, उसमें मैं प्रत्येक भारतीय को मिशन के काम में भागीदार बनाने का प्रयास करूंगा। जिस आर्थिक सहयोग से मैं अब तक बचता रहा, उसे भी मांगने में अब मुझे कोई संकोच नहीं होगा। जब आप सबकी मदद से यह अभियान थोड़ी गति पकड़ लेगा तब इसका तीसरा चरण शुरू होगा। मुझे विश्वास है कि उस चरण में हमें भी इंद्र (सरकार और कारपोरेट सेक्टर) का सहयोग बिना मांगे मिलेगा। लेकिन अभी हम जिस दौर में हैं, उसमें इंद्र से दूरी बनाकर रखना ही उचित है।

‘दान’ में निदानः

सनातन किष्किंधा मिशन की अर्थनीति को परिष्कृत करने में आदिलाबाद के गुरुजी रवीन्द्र शर्मा का बड़ा योगदान है। उनसे हमने समझा कि पारंपरिक भारतीय समाज में धन का हस्तांतरण कई रूपों में होता था जैसे- ‘दान’, ‘दक्षिणा’, ‘भिक्षा’, ‘तेगम (हिस्सा)’, ‘मान’, ‘मर्यादा’, ‘नोम’, ‘न्यौछावर’, ‘शगुन’, आदि। इन सब शब्दों के बहुत गहरे अर्थ हैं। उनसे जुड़ी हुई विशिष्ट प्रक्रियाएं और विधान हैं।

गुरूजी के अनुसार ‘दान’ की विभिन्न पद्धतियों का उद्देश्य, लोगों के अंदर ‘छोड़ने वाला’ मानस तैयार करना था। व्यक्ति एवं समाज को समृद्ध बनाने में ‘दान’ एवं ‘देते रहने’ के इन तरीकों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। ‘दान’ देने की यह प्रक्रिया केवल धनी लोगों तक सीमित नहीं थी। इसमें किसान, मजदूर सहित सभी लोगों को शामिल होने का मौका मिलता था।

हमारे मनीषियों ने ‘दान’ को लेकर एक विस्तृत प्रक्रिया विकसित की थी जिसे भारत का पारंपरिक समाज आज भी मानता है।

दान देने वाले के मन में स्वार्थ या अहंकार उत्पन्न न हो जाए, इसके लिए उसे व्रत आदि करके स्वयं को पवित्र बनाना होता है और इस प्रकार दान देने की पात्रता हासिल करनी पड़ती है। वहीं दान लेने वाले के मन में हीनभावना न आए, इसलिए उसे दान-दाता को आशीर्वाद देने के लिए कहा जाता है। दान लेने के बाद धन्यवाद कहने की परंपरा भारत में नहीं रही है। जहां दान दाता के लिए कुछ नियम हैं, वहीं दान प्राप्तकर्ता के लिए भी स्पष्ट निर्देश हैं। उसे सादगीपूर्ण विशिष्ट जीवनशैली अपनानी पड़ती है और जन-हित में जीवन जीना होता है।

सनातन किष्किंधा मिशन ने दान की इसी प्राचीन परंपरा को आधार बनाकर जन-जन से सहयोग लेने का निर्णय लिया है। आप चाहे धनाढ्य हों, मध्यवर्गीय हों या सर्वहारा वर्ग से हों, आप सभी सनातन किष्किंधा मिशन के इस यज्ञ में पूरी गरिमा के साथ यजमान बन सकते हैं। सच कहें तो हम उस विचार को चुनौती देना चाहते हैं जिसमें मान लिया गया है कि सामाजिक कार्य के लिए धन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केवल बड़ी-बड़ी कंपनियों, पूंजीपतियों और सरकार की ही है।

विशेष प्रक्रियाः

आज युगाब्द 5123 की विजयदशमी है। इस दिन से हम मिशन तिरहुतीपुर के लिए दान स्वीकार करने की अपनी विशिष्ट प्रक्रिया का शुभारंभ कर रहे हैं। हमारे जो शुभचिंतक हमें आर्थिक सहयोग देना चाहते हैं, उनसे अपेक्षा है कि वे कृपया-

(1). दशमी के दिन “सनातन किष्किंधा मिशन” को दान देने का संकल्प लें।

(2). एकादशी के दिन यथाशक्ति एकादशी व्रत का पालन करें। किसी कारण वश यदि व्रत करने में समस्या हो तो श्री हरि विष्णु या अपने ईष्ट को प्रणाम कर लें।

(3). द्वादशी के दिन व्रत का यथोचित पारण करने के बाद संकल्पित राशि का दान करें।

एक बार मैं फिर कहूंगा कि दान की मात्रा को लेकर हमारा कोई आग्रह नहीं है। हमारा आग्रह केवल प्रक्रिया को लेकर है। उसका पालन करते हुए हमें जो भी मिलेगा उसे हम बड़े आदर के साथ स्वीकार करेंगे।

इस बारे में अन्य आवश्यक विवरण जानने के लिए मेरे मोबाइल नंबर– 9582729571 पर व्हाट्सऐप के माध्यम से कृपया Yes लिख कर भेजें। साथ में यदि आप का कोई सुझाव या प्रश्न है तो उसे भी भेजें। अगर आप अपनी प्रतिक्रिया ईमेल से भेजना चाहते हैं तो कृपया मेरे व्यक्तिगत ईमेल- vimal.mymail@gmail.com का प्रयोग करें।

इस बार इतना ही। अगली डायरी अब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की दशमी अर्थात 1 नवंबर, 2021 को आएगी। तब तक के लिए नमस्कार।

विमल कुमार सिंह
संयोजक, मिशन तिरहुतीपुर

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